अपूर्वा:- इस संकलन में 23 जनवरी सन 1968 ई. से लेकर 5 अगस्त सन 1982 ई. तक की कुल 63 लघु कविताएं संकलित हैं. अपूर्वा (काव्य) पर केदारनाथ अग्रवाल को 1986 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. अपूर्वा की भूमिका में केदारनाथ अग्रवाल स्वयं इस काव्य संग्रह में संकलित कविताओं के बारे में लिखते हैं कि “मैं कविता की सांस्कृतिक सार्थकता का समर्थक कवि रहा हूँ और अभी भी हूँ. इससे मेरी कविता उतनी ही मेरी है जितनी की दूसरों की.
अपूर्वा में संग्रहित कविताएं विभिन्न समयों अर्थात 14 वर्षों की कालावधि में विभिन्न विषयों पर लिखी कविताएं हैं. इस काव्य संग्रह की कविताओं को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है.
1. मानव के दायित्व बोध संबंधी.
2. राजनीति और शासन संबंधी.
3. प्रकृति संबंधी.
1. मानव के दायित्व बोध संबंधी: इस प्रकार की कवितओं में दायित्ववान की हार और दायित्वहीनों के सफल छल-प्रपंच को दिखाया गया है. कविताओं में प्रगतिशीलता के तत्व भरपूर हैं, क्योंकि लोक जीवन की छटपटहट,खिन्नता और व्यवस्था के सड़-गल जाने के कारण मरम्मत का संवेग भी है. जैसे-
मुट्ठियों में कैद आदमी
घूँसा बना है
दीवार तोड़ने के लिए तना है
मगर दण्ड की
व्यवस्था से अनमना है,
संपुटित उसकी चेतना है. अपूर्वा पृष्ठ:20
आदमी का चरित्र कैसे धुँधला रहा है-
जहाँ
आदमी
आदमी होता है,
वहाँ
-आप नहीं-
आपके आदमी होने का धोखा होता है। अपूर्वा पृष्ठ:28
2. राजनीति और शासन संबंधी: मनुष्य की बदलती फ़ितरत विशेष कर सफेदपोश लोगों की गरीबों मजदूरों, अशिक्षितों एवं ग्रमीणों के प्रतिसोच क्या है-
मजे मारते मरते हैं
तथाकथित
प्रतिष्ठित आदमी;
तलातल में जी रहे
आदमियों के
कट्टर दुश्मन;
देखने में
महापुरूषृ-महिधर;
वास्तव में
दुष्ट दनुज-तस्कर।
समाज और सत्ता में राजनीति की बढ़ती ताकत की कुरूपता कैसे बढ़ रही है. स्वतंत्रता, समानता और सर्वेभवंतु सुखिनः के स्थान पर चापलूसी और चाटुकारिता का बढ़ता महत्त्व का एक दृष्य केदारनाथ ने प्रकट किया है-
चुनाव के पहले
आम आदमी रहा वह
पाँव-पाँव चलने का आदी रहा वह
अब, इमसाल, चुनाव के बाद
जीत की कुरसी हुआ वह
आम आदमी के बजाय चौपाया हुआ वह
लोग अब आदमी को नहीं-
चौपाए को- जीत की कुरसी को
सादर सलाम करते हैं
उसी के जिलाए जीते
और उसी के मारे मरते हैं।
प्रशासन जिसका काम था जनता के हितों का खयाल करना. आज़ादी का लाभ लोगों तक पहुँचाना. अधिकारी सेवक और लोक हितैषी के रूप में काम करना. क्या कुछ भी बदला? सरकारी मशीनरी केवल सत्ताधरियों के तलवे के नीचे पलने वाली एक गैर-जिम्मेदार संस्था बन कर रह गई. आम आदमी से उसका सरोकार कहाँ रहा है. प्रशासन केवल नेताओं के लिए उनके स्वार्थों को साधने का एक ऐसा औजार बन गई है जो जब जनता अपना अधिकार माँगने की कोशिश करती है तो वह जनता को ही रोक देने का कार्य करती है. गाँवों में थानों की हाल देखें-
गावों में थाने
और थानों में सिपाही हैं
थानों के जियाये
राज-तंत्र से सिपाही हैं
जनता को मिटाए
मार-तंत्र के सिपाही हैं। अपूर्वा पृष्ठ:61
3. प्रकृति संबंधी: इस संग्रह में अनेक प्रकृति उपादानों नदी,पेड़, मौसम, कलियाँ, फूल आदि के माध्यम से केदारनाथ अग्रवाल ने गाँव की सोंधी महक, खेतों और खलिहानों की चहक, लोक जीवन की महक को बिखेरा है. इन्होंने ऐसे दृश्य बिंब खींचे हैं कि पूरा गाँव-गिरांव अपने शोभित रूप में प्रकट होता है. वहाँ शोषण, अपराध,छल, माया सब है. किंतु सब के बावजूद प्रकृति का मनोहारी रूप भी है-
पेड़ महोदय!
कलियाँ खोलो,
कुछ तो हमसे
हँस कर बोलो। अपूर्वा पृष्ठ:75
प्रकृति का एक गतिशील बिंब है-
तैरता कुलकता है
महाकाश में
बादल का बेटा,
सफेद--- ऊनी--- मुलायम----
धरती की कोख का जाया
गभुआर मेमना। अपूर्वा पृष्ठ:35
कुलमिलाकर अपूर्वा में प्रकृति के सौंदर्य को निखारती कविताओं के अलावा राजनीति, प्रशासन, मानव के जीवन में बढ़ रही शोषण, स्वार्थ और दायित्व विहीन प्रवृतियों से ग्रस्त सत्ता की सड़क पर परेशान सत्जन और मालामाल स्वार्थी समाज जो खुद की बिछाई चाल में उलझ-उलझ कर दम तोड़ता रह रहा है. किंतु शुन्यदृष्टि और खलचरित्र की वजह से नरक में क्षणिक सुख की अनुभूति करता हुआ अपूर्वा काव्य में दिखाई पड़ता है. किंतु इस छटपटाहट में एक किनारे उजेला भी दिखाई देता है.
फटा अँधेरा फूहड़ फैला,
फटी
काल की झिल्ली।
धूमधाम से
निकला सूरज,
चेतन-
प्रतिभावान-
विजेता.
***
अपूर्वा में संग्रहित कविताएं विभिन्न समयों अर्थात 14 वर्षों की कालावधि में विभिन्न विषयों पर लिखी कविताएं हैं. इस काव्य संग्रह की कविताओं को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है.
1. मानव के दायित्व बोध संबंधी.
2. राजनीति और शासन संबंधी.
3. प्रकृति संबंधी.
1. मानव के दायित्व बोध संबंधी: इस प्रकार की कवितओं में दायित्ववान की हार और दायित्वहीनों के सफल छल-प्रपंच को दिखाया गया है. कविताओं में प्रगतिशीलता के तत्व भरपूर हैं, क्योंकि लोक जीवन की छटपटहट,खिन्नता और व्यवस्था के सड़-गल जाने के कारण मरम्मत का संवेग भी है. जैसे-
मुट्ठियों में कैद आदमी
घूँसा बना है
दीवार तोड़ने के लिए तना है
मगर दण्ड की
व्यवस्था से अनमना है,
संपुटित उसकी चेतना है. अपूर्वा पृष्ठ:20
आदमी का चरित्र कैसे धुँधला रहा है-
जहाँ
आदमी
आदमी होता है,
वहाँ
-आप नहीं-
आपके आदमी होने का धोखा होता है। अपूर्वा पृष्ठ:28
2. राजनीति और शासन संबंधी: मनुष्य की बदलती फ़ितरत विशेष कर सफेदपोश लोगों की गरीबों मजदूरों, अशिक्षितों एवं ग्रमीणों के प्रतिसोच क्या है-
मजे मारते मरते हैं
तथाकथित
प्रतिष्ठित आदमी;
तलातल में जी रहे
आदमियों के
कट्टर दुश्मन;
देखने में
महापुरूषृ-महिधर;
वास्तव में
दुष्ट दनुज-तस्कर।
समाज और सत्ता में राजनीति की बढ़ती ताकत की कुरूपता कैसे बढ़ रही है. स्वतंत्रता, समानता और सर्वेभवंतु सुखिनः के स्थान पर चापलूसी और चाटुकारिता का बढ़ता महत्त्व का एक दृष्य केदारनाथ ने प्रकट किया है-
चुनाव के पहले
आम आदमी रहा वह
पाँव-पाँव चलने का आदी रहा वह
अब, इमसाल, चुनाव के बाद
जीत की कुरसी हुआ वह
आम आदमी के बजाय चौपाया हुआ वह
लोग अब आदमी को नहीं-
चौपाए को- जीत की कुरसी को
सादर सलाम करते हैं
उसी के जिलाए जीते
और उसी के मारे मरते हैं।
प्रशासन जिसका काम था जनता के हितों का खयाल करना. आज़ादी का लाभ लोगों तक पहुँचाना. अधिकारी सेवक और लोक हितैषी के रूप में काम करना. क्या कुछ भी बदला? सरकारी मशीनरी केवल सत्ताधरियों के तलवे के नीचे पलने वाली एक गैर-जिम्मेदार संस्था बन कर रह गई. आम आदमी से उसका सरोकार कहाँ रहा है. प्रशासन केवल नेताओं के लिए उनके स्वार्थों को साधने का एक ऐसा औजार बन गई है जो जब जनता अपना अधिकार माँगने की कोशिश करती है तो वह जनता को ही रोक देने का कार्य करती है. गाँवों में थानों की हाल देखें-
गावों में थाने
और थानों में सिपाही हैं
थानों के जियाये
राज-तंत्र से सिपाही हैं
जनता को मिटाए
मार-तंत्र के सिपाही हैं। अपूर्वा पृष्ठ:61
3. प्रकृति संबंधी: इस संग्रह में अनेक प्रकृति उपादानों नदी,पेड़, मौसम, कलियाँ, फूल आदि के माध्यम से केदारनाथ अग्रवाल ने गाँव की सोंधी महक, खेतों और खलिहानों की चहक, लोक जीवन की महक को बिखेरा है. इन्होंने ऐसे दृश्य बिंब खींचे हैं कि पूरा गाँव-गिरांव अपने शोभित रूप में प्रकट होता है. वहाँ शोषण, अपराध,छल, माया सब है. किंतु सब के बावजूद प्रकृति का मनोहारी रूप भी है-
पेड़ महोदय!
कलियाँ खोलो,
कुछ तो हमसे
हँस कर बोलो। अपूर्वा पृष्ठ:75
प्रकृति का एक गतिशील बिंब है-
तैरता कुलकता है
महाकाश में
बादल का बेटा,
सफेद--- ऊनी--- मुलायम----
धरती की कोख का जाया
गभुआर मेमना। अपूर्वा पृष्ठ:35
कुलमिलाकर अपूर्वा में प्रकृति के सौंदर्य को निखारती कविताओं के अलावा राजनीति, प्रशासन, मानव के जीवन में बढ़ रही शोषण, स्वार्थ और दायित्व विहीन प्रवृतियों से ग्रस्त सत्ता की सड़क पर परेशान सत्जन और मालामाल स्वार्थी समाज जो खुद की बिछाई चाल में उलझ-उलझ कर दम तोड़ता रह रहा है. किंतु शुन्यदृष्टि और खलचरित्र की वजह से नरक में क्षणिक सुख की अनुभूति करता हुआ अपूर्वा काव्य में दिखाई पड़ता है. किंतु इस छटपटाहट में एक किनारे उजेला भी दिखाई देता है.
फटा अँधेरा फूहड़ फैला,
फटी
काल की झिल्ली।
धूमधाम से
निकला सूरज,
चेतन-
प्रतिभावान-
विजेता.
***