ब्रह्मानंद ने कृष्णानंद को किया नहीं प्रणाम। कृष्णानंद ने पूछा पंडित जी क्यों हो नाराज। क्यों नहीं करता तुम मुझको प्रणाम उम्र , ज्ञान , उपाधि , धन , दौलत , बल , विद्या और सौंदर्य में हूं तुमसे महान। क्या कारण है यजमान , नहीं करते हो प्रणाम। ब्रह्मानंद बोला तुम कुछ भी हो जाओ , किंतु होते हैं ब्राह्मण ही महान। क्या तुम्हें दीखता नहीं शिखा , तिलक , जनेऊं और भगवा वस्त्र हमारा। जन्मना हम श्रेष्ठ है , यही है ईश्वर का विधान , इसलिए हे कृष्णानंद हमको करो प्रणाम। माना शिखा तुम रखा है , शिखा मैं रख लेता हूं , वस्त्र भगवा जनेऊं धारण कर तिलक विधान कर लेता हूं। सुनो! ब्रह्मानंद , करो प्रणाम विद्याज्ञान तुझे मैं देता हूं। सब कुछ कर लो कृष्णानंद , जन्म कहां से लाओगे। गुरु श्रेष्ठ भले हो जाओ तुम , जायते श्रेष्ठ नहीं हो पाओगे। जन्म तुम्हारा श्रेष्ठ है कैसे यह बतलाओ ब्रह्मानंद ? पितृ मुखा से , मात्रृ गुदा से कहां से तू जन्माया है। श्रेष्ठ हो तुम कैसे मानव से ? यह भ्रमाभिमान ही तुम पाया है। करो प्रणाम , भूलो अभिमान , नहीं तो अधम नर कहलाओगे। नहीं मानता श्रेष्ठ...