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जरुरत

कभी कभी आत्मा को इतना दर्द होता है
उसको बया करना खुद पे शर्म  होता है,
वो हमें सिखाते आधुनिकता की शैली,
जिसमें होता है जिस्म बेच कर जीने की कला
अपनी ही जनता को चूना लगाने की कला
एक इंच जमीन बढा न सके,
पर आजदी के नाम पर बेच देने की कला
 वे पढ़वाते हैं आत्महीनता का पाठ
जिसमें होता है नौकरी पाने की कला
बडे बडे आईआईटी और आईआईएम खोलो गए हैं,
शायद वहाँ सिखाया जाता है ....
देश को खाजाने की सबसे अच्छी कला
क्यों नहीं आजतक निकला इन श्रेष्ठ संस्थानों में कोई ऐसा
जो समझा हो इस देश की आवश्यकता ???
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यह देश किसका है?

बहुत दिनों के बाद आज कुछ लिखने का मन मरोड़ रहा है - पश्चिम बंगाल के रेल दुर्घटना ने मानो दिल को बहुत चोट पहुँचाई. जिस प्रकार हमारे देश में प्रशासनिक दुर्व्यवस्था है, शायद वैसा संसार में कहीं नहीं. एक ओर यह देश उन लोगों के हितों की रक्षा करता है जो पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त किए हैं या उसके पोशक हैं. दूसरी ओर इस देश के आम नागरिक जिन्हें वास्तव में सहायता और संरक्षा की आवश्यकता है, उसे कुछ नहीं मिल रहा है. एक उदाहरण देखें- इस देश की व्यवस्था में उस विद्यार्थी को स्कालरशीप प्राप्त होती है जिसके पास पाँच-छे लाख रूपये खर्च करने की क्षमता है, अंग्रेजी का भर पूर ज्ञान है तथा बोर्ड-परीक्षा में अच्छा खा़सा मार्क है. ज़रा सोचिए यह योग्याता प्राप्त व्यक्ति क्या सहायता या संरक्षा का अधिकारी है? या फिर-वे विद्यार्थी जिनके पालक पढ़े लिखे नहीं हैं, अंग्रेजी बोलने का वातावरण ही ठीक से नहीं प्राप्त हुआ तथा अजागरूक परिवार और पृष्ठ भूमि होने की वज़ह से बहुत अच्छा-ख़ासा मार्क भी नहीं है? क्या यह उस देश के नागरिकों के साथ अपमान नहीं है जहाँ की व्यवस्था पूरी तरह आम़ नागरिकों के विकास के विरुध हो.

कंप्यूटर और शिक्षा

भारत सरकार बहुत कोशिश कर रही है कि कैसे शिक्षा को जन जन तक पहुँचाया जाय. इसके लिए सबसे सरल उपाय यह है कि कंप्यूटर को मोबाइल जैसे सस्ता कर आम लोगों के पहुँच में लाया जाय और इंटरनेट सस्ता किया जाय जैसे सौ रूपय मासिक अन्लिमिटेड.

लोक-चेतना

दिखाई देता है अंकों, सनदों का व्यापार,
स्कूलों और कालेजों में बिकता अध्यापक,
पहुँच वालों का बोलबाला है,
वही अंकों में सबसे आगे वाला है?
यह सच नहीं बल्कि घोटाला है,
फिर भी वही नौकरी पाने वाला है,
कोई नहीं बोलने वाला है,
सब जानते हैं वह घोटाला है,
क्योंकि सबका मुहँ काला है.