हिन्दी मीडिया से अपेक्षाएं

प्रथम सही कदम :- यह नवभारत टाइम में प्रथम बार छपा ऐसा लेख है जो भारत की प्रकृति की स्वाभाविकाता को दिखाता है और यह देश इसी मार्ग पर चल कर उन्नति कर सकता है। अन्य कोई मार्ग देश की जनता के हित में नहीं है? हमारे अनेक मित्र हैं जो देश के दिक्षण भागों में कार्यरत है, हमें अक़सर एक दूसरे के क्षेत्रों में जाना पड़ता है। हमनें देखा है कि अंग्रेजी भाषा हमारी सहायता केवल उच्च स्तर पर ही कर पाती है जबकि दैनिक कार्य करने के लिए हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है। मेरे एक दोस्त है जो तमिलनाडु के है ।महोदय को केन्द्रीय व्यवस्थापक पद पर नियुक्त कर महाराष्ट्र के बर्धा जिले में भेज दिया गया। उन्हें हिन्दी का केवल पानी शब्द ही मालूम था, दूकानों पर सामान लेने और रास्ता पूछने ,होटल पर खाना खाने में इतनी परेशानी झेलनी पड़ी की वे अंग्रेजी के पंडित होते हुए भी खुद मुझसे हिन्दी सीखा और अब केवल चार महिनों में कमाल की हिन्दी बोलने लगे हैं और भाभी भी सीख गई है। बच्चे हिन्दी उतना ही अच्छा बोलते हैं जितना की हमारे बच्चे। अब यह स्पष्ट हो जाना चाहिए की भारत की प्राकृतिक सम्पर्क भाषा कौन है? और कितना सरल व सहज है। परंतु दुर्भाग्य यह है कि स्कूलों में जिस तरह से इस भाषा की उपेक्षा हो रही है कि हमारे बच्चे लिखना भूल जा रहे है और राष्ट्र की सदियों पूराना चिर अपेक्षित एकता का कार्य अधूरा रह रहा है। अब तो कुछ स्वार्थी लोग इसे राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं। अत: 12वीं तक संपर्क भाषा का पठन-पाठन कम से कम सी.बी.एस.ई. में तो अनिवार्य किया जाना चाहिए नहीं तो कहीं देर न हो जाय? और देश केन्द्रीय शक्ति के अभाव में टूट और लूट का शिकार न बन जाय। ज़रा सोचें?

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