जनमार्ग के रोड़े

 हमेशा देखता आ रहा हूँ कि काम कोई कर रहा है और चालबाज उसका हिस्सा खाए जा रहे हैं और काम करने वाले पता भी चल रहा है कि उसका सबसे बड़ा अहित साधक, उससे इर्ष्या करने वाला, झूठा हमसफर बन उसके साथ चलता जा रहा है--- अब उसका असली चेहरा मेरे सामने है और उसे आप भी देखें-----
जनमार्ग के रोड़े

हमारे देश में,
कुछ ऐसे तत्व हैं,
जो खाते तो इस देश के हैं,
पर गाते परदेश के हैं,
बनना चाहते हैं,
नेता यहां के काली, भूरी जनता के,
पर सदा साथ देते हैं-
शोषकों और शोषण अस्त्रों को,
कभी-कभी शर्म करते हैं,
जनता की बोली बोलने में,
उनके संग ऊंचे मंचों पर बैठने में,
बताते हैं,
लोगों को अपने से छोटा।
गलत और स्वार्थी रास्तों से
रोकते हैं, लोगों का विकास मार्ग
घोषित करते हैं खुद से,
खुद को,
वे हैं,
विकसित सरताज,
चाहते हैं,
बना रहे अंधविश्वास,
बना रहे अविज्ञान का वास,
ताकि
सुरक्षित रहे,
उनके सर का ताज।
इन्हीं खोटो ने
बुलाया देश के,
दुश्मनों को हर बार,
करने के लिए सुरक्षित खुद का ताज।
भेद-भाव बढ़ाते, खुद को विशिष्ट कहाते,
बढ़ाते पीड़ा और संताप,
खाते गरीब जनता के रक्त पसीने का परताप
हिस्सा और हक़ खाने के लिए
गरीबों का,
बिछाते षणयंत्रों का जाल,
बनते झुठ्ठे,
लोगों का हमराह,
देते दुश्मन का छिप साथ,
यही हैं!
देश के गद्दार,
बिछाते रोड़े ये जनमार्ग,
बताओ कैसे होगा ?
जनताज।
बनेगा कैसे?
जनविकास का मार्ग।
मारो इनको जूते चार
बनाओ अपना जनहित मार्ग,
तभी होगा हम सबका कल्याण
बनाओ खुद विकास का मार्ग।।

संतोष कुमार यादव दिनांक 18.04.2015

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