"ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोई! और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।"
"ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय!
और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।"
और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।"
यह लोकोक्ति भारत के गांव के कोने-कोने में बोली जाती है। वास्तव में देखा जाए तो हर समाज में दोगले किस्म के लोग होते हैं। किंतु भारत एक जाति आधारित समाज है। जातियां पेशा को प्रकट करती है, अर्थात वह कार्य जो पारंपरिक रूप से उन जातियों के लोग करते आए हैं।
जातियां वास्तव में एक समूह है, एक वर्ग है। जो सामान कार्य परंपरा पर आधारित है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे डॉक्टर, शिक्षक, पानवला, नेता। आज इन्हें भी एक जाति के रूप में देखा जा सकता है।
ब्राह्मण समाज अपने को श्रेष्ठ समझ कर प्रत्येक जातियों के कार्यों के अनुसार उन्हें छोटा बताने के लिए हमेशा चालें चलता रहा है। इसलिए पूरा हिंदू समाज ब्राह्मण की चालाकियों से परिचित है। लेकिन जब से पैदा होने के कारण लोग अपने को ब्राह्मण और मेरिट धारी कहने लगे। तब से यह बात हिंदू समाज को और अधिक समझ में आने लगी है। हिंदू समाज में ब्राह्मण जाति के लोग अपनी धूर्तता से समाज में नफरत के पात्र बन गए हैं। इसीलिए लोग उन्हें अविश्वसनीय मानते हैं। प्राय यह देखा जाता है कि जो जाति से ब्राह्मण है, उसे किसी तरह का ज्ञान नहीं है। किंतु वह अपने अहंकार और जाति अभिमान के कारण सदैव स्वयं को श्रेष्ठ होने का दिखावा करता है, जबकि वह होता नहीं है। उसकी इस मूर्खता को पढ़ा लिखा हिंदू समाज समझ जाता है। जब उसका विरोध करता है तो जाति से ब्राह्मण व्यक्ति घृणा, ईर्ष्या और वैमनस्य की सीमा तोड़ देता है। वह अपने हिंदू समाज के अशिक्षित लोगों के साथ, कमजोरों के साथ शुद्रता का निम्नतम व्यवहार करता है।
आपको खबर होगी कि एक जितेन्द्र पाठक अपने भांजे की विधवा से ब्याह करना चाहता था। विधवा के पास 2 वर्ष का लड़का था। विधवा उसे ब्याह नहीं करना चहती थी। किंतु वह नीच, शुद्र जाति का ब्राह्मण ने उस दुखियारी महिला, विधवा स्त्री पर कितना अत्याचार किया होगा, उसे अपने बस में करने लिए। जब वह इन तरीकों से सफल नहीं हुआ तो उसने उसके बच्चे की पटक पटक कर हत्या कर दी।
उक्त घटना उस जाति के बह्मण व्यक्ति की शुद्रता की न्यूनतम स्तर को प्रकट करती है।
अत यही कारण है कि हिंदू लोग ब्राह्मण को वेश्या से भी गिरा समझने लगे हैं।
अतः लोक में प्रचलित कहावत-
"ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय!
और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।" - राजकुमार भाटी
और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।" - राजकुमार भाटी
हिंदू समाज के संदर्भ में उपयुक्त बैठती है। इसलिए शिक्षित हिंदू समाज ऐसी कहावतों को सत्य और सच्चाई के नजदीक देखता व मानता है।
अतः हिंदू समाज अब धीरे-धीरे जाति के ब्राह्मण को नहीं बल्कि कर्म से ब्राह्मण और ज्ञानी को जमीनी स्तर पर, गांव-गिरावं में महत्व देने लगा है। धीरे-धीरे ही सही किंतु हिंदू समाज में जाति व्यवस्था टूटने के लिए चरमरा रही है।