हिन्दी और अंग्रेजी तथा भारत

हिन्दी और अंग्रेजी तथा भारत
एक आलेख

वैश्वीकरण का युग है दुनिया एक गाँव में बदल रही है. भारत भी इस दुनिया का एक हिस्सा है अत: यह भी इस प्रक्रिया में सम्मिलित है परंतु भारत देश की जनसंख्या का बहुत ही कम हिस्सा इस खेल में सम्मिलित है जिसका अधिकतम प्रतिशत 10 से कम है जबकि भारत के साथ स्वतंत्र हुआ देश चीन सभी क्षेत्रों में हमसे बहुत आगे जा चुका है. इसका कारण क्या है? क्या इस देश के नीति-निर्माताओं ने सोचा? क्यों अभी तक हम आम नागरिकों को प्रगति की धारा से नहीं जोड़ पाए? ज़रा सोचें-विचारें- यदि हम दुनिया के विकसित और विकासशील देशों को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो तीन वर्ग दिखाई देता है- 1.अमेरिका-यूरोप- अंग्रेजी अन्य निकटतम भाषा-भाषी
2.जापान-कोरिया-चीन-चित्रात्मक भाषा
3.भारत-दक्षिण एशिया- हिन्दी और अन्य भाषा-भाषी
1.अमेरिका-यूरोप- अंग्रेजी अन्य निकटतम भाषा-भाषी:
अमेरिका,कनाडा, इंगलैण्ड, फ्रंस, जर्मनी, इटली आदि देशों के नागरिकों के विकास के पिछे भिन्न-भिन्न कारण हैं अमेरिका ,कनाडा और आस्ट्रेलिया आव्रजित (माइग्रेटेड) जनसंख्या के देश हैं यहाँ बहुभाषा समूह नहीं है इनकी शासन-प्रशासन, शिक्षा,सम्पर्क, विधायिका और न्यायपालिका की मुख्य भाषा अंग्रेजी-फ्रेंच है जो इनकी संस्कृति और समाज का ही अंग है जो इनके मौलिक विकास में सहायक है बाधक नहीं. यूरोपीय देशों इंगलैण्ड, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ब्राजील आदि प्राचीन सभ्यता के देश हैं परंतु संस्कृति रूप से वे संनिकट होते हुए भी ये देश शासन-प्रशासन, शिक्षा, सम्पर्क, विधायिका और न्यायपालिका की भाषा राष्ट्र भाषा को बनाया है जबकि इन्हें अंग्रेजी सीखना उतना ही आसान है जितना कि मराठी-गुजराती भाषी को हिन्दी सीखना. अत: इस समूह के नागरिकों के विकास में भाषा की बाधा नहीं आती है जिसके कारण यहाँ के नागरिक अपनी आवश्यकता के अनुसार विकास का मार्ग चुनते है तथा प्रगति की उच्चतम सीमा को स्पर्श करते हैं. नागरिकों सामान्य न्यायिक एवं प्रशासनिक कानूनों का ज्ञान होता है अत: नेता, शासक, प्रशासक, व्यापारी जनता का शोषण नहीं कर पाते, विकास में बाधा नहीं बन पाते, सभी जगह कानून का राज होता है परिणाम स्वरूप जनता का स्वाभाविक विकास होता है. समाज में भ्रष्टाचार निम्नतम रूप में रहता है, भारत आदि देशों से इसके विपरीत स्थितियाँ हैं. जो जन सामान्य के विकास में सहायक न हो कर बाधक अधिक हैं.
2.जापान-कोरिया-चीन-चित्रात्मक भाषा: जापान, कोरिया, चीन आदि देशों को देखें, ये देश अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा में देश का शासन-प्रशासन, शिक्षा, विधायी-कार्य, न्यायालयी-कार्य आदि का सम्पादन करते है जिससे वहाँ की जनता राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ी रहती है तथा प्रगति के कार्यों में उनका योगदान बना रहता है. देश का कानून और प्रक्रियों का उन्हें लाभ प्राप्त होता है. यहाँ तक कि विश्व भाषा के रूप में अंग्रेजी का अध्ययन इन देशों में भी होता है परंतु उसकी अनिवार्यता नहीं होती है अर्थात वह बाधक के रूप में कार्य नही करती है. राष्ट्रभाषा में शिक्षा और प्रशासन होने के कारण ज्ञान का प्रसार आसानी से सामान्य नागरिकों तक पहुँच जाता है जिसका परिणाम यह हुआ कि इन देशों से गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली जनसंख्या की प्रतिशत में भारी सुधार हुआ है. जबकि भारत जैसे अन्य देश कोशिशों के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं प्राप्त कर सके हैं.
3.भारत-दक्षिण एशिया- हिन्दी और अन्य भाषा-भाषी: यदि आप उन देशों पर विचार करें जिन्हें थर्ड-कंट्री का देश कहा जाता है, मूलत: ये देश ब्रिटिश या अन्य साम्राज्यवादी देशों के शासन से स्वतंत्र हुए हैं और पुरानी सभ्यता के देश हैं जहाँ बहुभाषी, बहुजातीय समूह अवस्थित हैं, एसे देशों में दो वर्ग देखने को प्राप्त होते है.प्रथम वह वर्ग है जो साम्राज्यवादी संस्कृति को आत्मसात कर लिया है तथा स्वतंत्रता के वाद सत्ता, समृद्धि का केन्द्र बन गया है. दूसरा वह वर्ग है जो देशी संस्कृतियों से ओत-प्रोत है, पिछड़ा है. उसके विकास में अनेक बाधाएं है जैसे- दोहरी शिक्षा नीति के कारण एसे देशों में दो प्रकार की शिक्षा व्यवस्थाएं है एक अंग्रेजी माध्यम पर आधारित महँगी शिक्षा जो अप्रत्यक्ष रूप में विधायिका, न्यायपालिका, शासन-प्रशासन, शिक्षा व्यापार का आधार बनी हुई है, अमीर और पूर्व शिक्षित लोग इसका लाभ उठा के ग्लोब्लाइजेशन का लाभ उठा रहे हैं, दुनिया में जो कुछ हो रहा है उनके हित में हो रहा है. दूसरी और एक बहुत बड़ा वर्ग है जो देशी है जो अपनी सदियों पुरानी सभ्यता एवं संस्कृति से जुड़ा हुआ है, प्राय: गरीब है, मजदूरी या किसानी उसका पेशा है, अशिक्षित या साक्षर है देशी स्कूलों अर्थात नेटिव भाषा माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहा है या पढ़ा है. एसे लोगों को अशिक्षित माना जाता है, इन्हें न तो प्राइवेट सेक्टर ,न सरकारी सेक्टर में सर्विस मिलती है, इनकी भाषा, इनके ज्ञान का कोई महत्त्व नहीं होता है क्योंकि भारत जैसे देश में अंग्रेजी ही भगवान है, अंग्रेजी शोषण का साधन, भ्रष्टाचार का कारण है, भारत के स्वाभाविक विकास में बाधा है, हजारों-हजार छात्रों पर अंग्रेजी भाषा को प्राथमिक कक्षाओं से पढ़ने के लिए बाध्य किया जाता जिससे छात्रों की रुचि शिक्षा से विमुख हो जाती है, शासन प्रशासन से जूड़ॆ लोग भ्रष्टाचार भी करते हैं और आरोप लगाकर निर्दोष को दोषी भी सिद्ध कर देते हैं. आम जनता इसके कारण से त्रस्त है.परिणाम स्वरूप आम आदमी गरीब और दलिद्र बनने के लिए मजबूर है. इस तरह से देखें तो अंग्रेजी तथा अनांगेजी दो वर्ग है, अंग्रेजी वर्ग की मानसिकता अनांग्रेजी वर्ग के विरूध सदैव देखी जा सकती है. अत: इंडिया प्रोग्रेसिव है भारत अशिक्षित दलिद्र और पिछड़ा है. यदि भारत के सम्पूर्ण मानव पूँजी का दोहन करना है तो इस विभाजन की खाईं को पाटना पड़ेगा. जिससे देश की 80% जनसंख्या को मुख्यधारा में लाया जा सके और देश का तीव्र गति से विकास हो सके. अन्यथा चीन का मुकाबला करना दिवास्वपन जैसा होगा. अंग्रेजी-अनांग्रेजी वर्ग की खाईं को पाटने के उपाय:
1. राष्ट्रभाषा सहित क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीकी प्रोद्योगिकी का वैश्विक स्तर का विकास करना होगा.
2. विश्वभाषा आवश्यक बनाई जाय परंतु इसकी अनिवार्यता खत्म की जाय.विशेषत: शिक्षा, व्यापार, प्रशासन, विधायिका, न्यायपालिका आदि महत्त्व पूर्ण क्षेत्रों से तथा सभी कार्य हिन्दी और अंग्रेजी/क्षेत्रीय भाषा में होने चाहिए. 3. भारत में किसी भी प्राकार की सेवा प्रदाय संस्थाओं, व्यक्तिओं को राष्ट्रभाषा का ज्ञान अनिवार्य होना चाहिए. भारत में बिकनेवाली सभी वस्तुओं पर सूचनाएं राष्ट्रभाषा में अनिवार्य होना चाहिए.
4. सभी प्रकार की राष्ट्रीय स्तर की सेवा-परीक्षाओं में राष्ट्रभाषा की परीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए.
अगर उपर्युक्त समस्याओं का उचित समाधान खोज लिया जाय तो भारत की मानव पूँजी का 80% दोहन कर सकते हैं देश की विकास दर भी बढ़ेगी तथा समरस विकास होगा. और अगले 20 वर्षों में अमेरिका, चीन हमसे पीछे होंगे.

लेखक : आकाश

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