आज मुझे समझ में आया
दुनिया में सब कुछ है माया
पर फिर भी आप जब पाया है जन्म
तो जीना पड़ेगा इसी संसार के लोगों के साथ
जो ठोंगी हैं, स्वार्थी हैं और सरारती हैं
कोई भी नहीं है जो सच को सच कहने की शक्ति रखता हो,
क्यों की स्वार्थ में लिप्त व्यक्तियों को खुद का लाभ ही सच्चा दिखाई देता है
मगर हरदम हैं परेशान पर नहीं करते आराम
खुद नरक भोग रहे हैं, चाहते हैं दूसरे भी उनके जैसा भोगें
ताकि दोनों हो जाय बराबर
पर ऐसा नहीं होता,
जो जैसा बोता है वह वैसा ही काटता है
कुछ तत्कालीन सफलताओं को चिरस्थाई समझने वाले
चिर स्थाई आन्नद से सदा रहते है महरूम
मन और तन की आश नहीं होती है पूर
घुस लेते हैं काम नहीं करते
दलाली करते हैं इताराम नहीं करते
कहते हैं हमारा परिवार घर हो रहा वेकार है
घर में पागल ओर टेढ़े मेढ़े पैदा हो गए
खुद तो थे शानदार पर पैदा हुए जानवर
सोचो ऐसा क्यों होता है अक्सर
तुम लोगों के साथ,
क्यों विनाश हो जाता है खुद ब खुद
कभी समझा है राज
क्यों कि गीता में कहाँ है कृष्ण ने
कर्म का फल बनता है महराज।


संतोष कुमार यादव 

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