हमारे देश में रंगोत्सव अथवा होली का त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति का एक अंग है रंगोत्सव। भारतीय स्कूलों में इस तरह मनाया जाता है यह होली जिसे फगुआ का उतेसव-
अहीर या आहिर शब्द का अर्थ होता है, वीर, बहादुर, निडर, भयहीन। यह शब्द संस्कृत के आभीर शब्द से बना है। यह शब्द आभीर जनजातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। ये जाति बहुत बहादूर और निडर स्वभाव की होती है। इनमें गोत्र और खाप परंपरा के अनुसार पंचायतें चलती है। इन्हें अपनी रक्त शुद्धि पर बहुत गर्व रहता है। भगवान श्री कृष्ण इसी जाति में पैदा हुए थे। वास्तव में समाज में यह मुहावरा प्रचलित है कि अहीर होना अर्थात निडर होना, साहसी होना। भारतीय समाज में स्त्रियों का सपना होता है कि उन्हें अहीर गुण वाला पति मिले। क्योंकि आभीर उच्चकोटि के प्रेमी होते हैं। बचन के पक्के होते है, साहस, वीरता के साथ-साथ इनमें दया, धीरता और रक्षा के भाव भरे होते हैं, शायद इसलिए नारी जाति इन पर बहुत भरोसा करती है और मन ही मन अहीर जैसे वर की कल्पना करती रहती हैं। आभीर जनजाति दुनिया की बहादुर और भयानक आक्रांता के रूप में प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है। यह जनजाति अपने प्रारंभिक काल से घुमंतू प्रकृति की थी, क्योंकि इसके जीवन यापन का आधार पशुपालन था। गाय, भैंस , बकरी आदि का पालन करने के लिए घास के मैदान और मीठे पानी की आ...
पूरे विश्व के अहीर, जाट व गूजर भाइयों और बहनों, अहीर का मतलब यादव ही होता है। इसे विभिन्न अन्य नामों से भी स्थानीय स्तर पर जानते हैं। जैसे - ग्वाल, गोपाल, गवली, गोल्ला, धनगर, पाल आदि। जाट और गूजर भी अहीर की ही शाखाएं हैं। या ऐसा कहें कि जाट, गूजर और अहीर एक ही जनजाति हैं। ये जातियां भारत की सबसे श्रेष्ठ जातियां हैं। कथित पूजा पाठ का काम करने वाली जातियां आज अपने के ब्राह्मण कहती हैं। जबकि दुनियां में ब्राह्मण जाति नहीं बल्कि पद सोपान हैं, जिसे कोई भी मनुष्य अपने कर्म के अनुसार प्राप्त कर सकता हैं। अहीर, जाट और गूजरों के मंदिरों में जो पूजारी काम करते हैं, स्वयं को ब्राह्मण कहते फिरते हैं। इसी प्रकार शूद्र पुजारी जनता के घरों में पूजा-पाठ करते हैं और जीवन यापन करते हैं। मान प्राप्त करने के लिए कभी स्वयं को ब्राह्मण कहने लगते हैं। वास्तव में जैसे धोबी कपड़ा धोता है, चमार चमड़े का काम करता है, नाई बाल काटने का कार्य करता है, वैसे ही पूजारी- पूजा पाठ का कार्य करता है। भारत में जातियां कामों के आधार पर संगठित हैं। कोई जाति छोटी और बड़ी नहीं होती। शूद्र का मतलब छोटा या तुच्छ होता है। जो...