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"ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोई! और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।"

" ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय! और कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।" यह लोकोक्ति भारत के गांव के कोने-कोने में बोली जाती है। वास्तव में देखा जाए तो हर समाज में दोगले किस्म के लोग होते हैं। किंतु भारत एक जाति आधारित समाज है। जातियां पेशा को प्रकट करती है, अर्थात वह कार्य जो पारंपरिक रूप से उन जातियों के लोग करते आए हैं। जातियां वास्तव में एक समूह है, एक वर्ग है। जो सामान कार्य परंपरा पर आधारित है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे डॉक्टर, शिक्षक, पानवला, नेता। आज इन्हें भी एक जाति के रूप में देखा जा सकता है।  ब्राह्मण समाज अपने को श्रेष्ठ समझ कर प्रत्येक जातियों के कार्यों के अनुसार उन्हें छोटा बताने के लिए हमेशा चालें चलता रहा है। इसलिए पूरा हिंदू समाज ब्राह्मण की चालाकियों से परिचित है। लेकिन जब से पैदा होने के कारण लोग अपने को ब्राह्मण और मेरिट धारी कहने लगे। तब से यह बात हिंदू समाज को और अधिक समझ में आने लगी है। हिंदू समाज में ब्राह्मण जाति के लोग अपनी धूर्तता से समाज में नफरत के पात्र बन गए हैं। इसीलिए लोग उन्हें अविश्वसनीय मानते हैं। प्राय यह देखा जाता है ...

उत्तर प्रदेश में जनगणना कैसे हो रही है?

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जैसा कि सबको मालूम है पूरे देश में जनगणना 2026 चल रही है। इधर जनगणना का एक वास्तविक स्वरूप मैं अपने गांव में देखा। जनगणना कर्मी एक जगह बैठ जाते हैं और पूरे गांव के लोगों की सूचनाएं और लोगों की गिनती अपने इच्छा और समझ के अनुसार लिख लेते  हैं। वास्तव में यह एक फेक डेटा होता है। प्रशासन को चाहिए कि जनगणना में यह सुनिश्चित करे कि जनगणना कर्मी गिनती किए गए परिवार के किसी सदस्य का हस्ताक्षर उसके आधार कार्ड नंबर के साथ अवश्य लें। सरकार एक बार जाने के लिए 9000 हजार रुपए दे रही है, किंतु जनगणना कर्मी विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार में फेक डेटा बना रहे हैं। वास्तव में देख कर ऐसा लग रहा है कि जब डेटा ही गलत होगा तो उस पर बनी नीतियों का प्रभाव कैसे सही होगा।

महुआ के गुण

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महुआ का बागीचा  महुआ के पेड़ का पौधा यह केवल भारत में पाए जाने वाला पेड़ है। यह पाकिस्तान और बांग्लादेश मेंभी कहीं कहीं मिलता है। मूलतः इस भारतीय वृक्ष कह सकते हैं। यह एक बहुत ही उपयोगी औषधि और बहुत बड़ा वृक्ष है। इसके फल और फूल दोनों खाद्यान्न और दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके फूल को महुआ और फल को कोइया कहते हैं। इसके बीज से तेल निकलता है। जो औषधि होता है। महुआ के तेल का उपयोग करने से हार्ट की बीमारियां ठीक हो जाती हैं।  धीरे-धीरे अब यह विलुप्त होता जा रहा है। इस वृक्ष की उपयोगिता पर रिसर्च करने की बहुत आवश्यकता है। मुझे ऐसा लगता है कि यह है भारत में नींबू पनी और दूध दही जैसा ही उपयोगी होगा। इसकी खेती के और उपयोगी बनाकर विदेशी मुद्रा विशेषकर डालर अर्जित किया जा सकता है।

बिल्ली और उसके बच्चे पर तपती गर्मी का असर

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उत्तर प्रदेश में इस समय भयानक गर्मी पड़ रही है। जिससे जंगलों की कटाई के कारण जीव-जंतुओं को पानी और खाने की पानी बहुत बड़ी समस्या हो गई है। नदिया पूरी तरह सो चुकी हैं, छोटे छोटे गड्ताढे ताल तलैया या पानी श्रोत थे, या तो उन्हें भर दिया गया है अथवा उन्हें कब्जा लिया गया है। जिसकी वजह से छोटे-छोटे जानवरों को जो पालतू नहीं हैं। उन्हें जीवन बचाना मुश्किल हो गया है। ऊपर से दूसरे शिकारी जानवरों से उनके बच्चों की रक्षा खुले में रक्षा की बहुत भारी समस्या है।  यह एक मात्र दृश्य नहीं है बल्कि रोज समाप्त हो रहे जीव-जंतुओं के विलुप्त होने की जलवायु परिवर्तन की समस्या के रूप में देखे जाने की जरूरत है।

भारत के गांव का दृश्य

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यह तस्वीर भारत के गांव की है। इस तस्वीर की सुंदरी को महसूस  कीजिए। क्या आपको अपनी बचपन की याद आती है। यहां का जीवन बहुत सरल लगता है, किंतु इतना आसान नहीं है। निश्चित रूप से जटिलताओं का अभाव है। आनंद खुशी और समय का भी अवसर मिलता है।

मेरा भारत महान क्यों है ?

मेरा भारत सच में महान है। 5G प्लस प्लस का नेटवर्क 2G के समान है। जिओ अपना इतना करता प्रचार है किंतु वास्तव में उसका नेटवर्क एकदम बेकार है। लोगों के पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, बीएसएनल जो गवर्नमेंट की नेटवर्किंग संस्था है पहले ही मर चुकी है। एयरटेल बचा है जिसकी सेवा बहुत कम जगह पर उपलब्ध है। बाकी कोई कॉम्पिटेटिव नेटवर्क कहीं नहीं भारत देशवा में बचा है। जनता त्राहि त्राहि करती है, नेता जनता पर मरता है। वास्तव में कुछ नहीं करता है। सच कहूं तो बिजली तो नहीं थी, सोशल मीडिया के भरोसे लोग जी रहे थे। जी क्या बस समय पास कर रहे थे। अब तो नेटवर्क बिजली का बाप बन गया है। इंटरनेट सरकारी नल से चूता हुआ पानी बन गया है। अपने भारत देशवा का यही घर घर की कहानी हो गया है।

ब्राह्मण भी शूद्र होता है

पूरे विश्व के अहीर, जाट व गूजर भाइयों और बहनों, अहीर का मतलब यादव ही होता है। इसे विभिन्न अन्य नामों से भी स्थानीय स्तर पर जानते हैं। जैसे - ग्वाल, गोपाल, गवली, गोल्ला, धनगर, पाल आदि। जाट और गूजर भी अहीर की ही शाखाएं हैं। या ऐसा कहें कि जाट, गूजर और अहीर एक ही जनजाति हैं। ये जातियां भारत की सबसे श्रेष्ठ जातियां हैं। कथित पूजा पाठ का काम करने वाली जातियां आज अपने के ब्राह्मण कहती हैं। जबकि दुनियां में ब्राह्मण जाति नहीं बल्कि पद सोपान हैं, जिसे कोई भी मनुष्य अपने कर्म के अनुसार प्राप्त कर सकता हैं।  अहीर, जाट और गूजरों के मंदिरों में जो पूजारी काम करते हैं, स्वयं को ब्राह्मण कहते फिरते हैं। इसी प्रकार शूद्र पुजारी जनता के घरों में पूजा-पाठ करते हैं और जीवन यापन करते हैं। मान प्राप्त करने के लिए कभी स्वयं को ब्राह्मण कहने लगते हैं। वास्तव में जैसे धोबी कपड़ा धोता है, चमार चमड़े का काम करता है, नाई बाल काटने का कार्य करता है, वैसे ही पूजारी- पूजा पाठ का कार्य करता है। भारत में जातियां कामों के आधार पर संगठित हैं। कोई जाति छोटी और बड़ी नहीं होती। शूद्र का मतलब छोटा या तुच्छ होता है। जो...

आज बहुत दिनों के बाद

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आज बहुत दिनों के बाद रविवार को बैठा हँ अपने क्वार्टर के बाहर, दुनिया से अकेला एक ऐसे बिहड़ जगह पर जहां कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं आता, दूर दराज तक जंगल ही जंगल है, संपर्क का लैंडलाइन का सहारा है, बस बीएसएनल भाई का सहारा है, न जीवो न एअरटेल, न कोई और नेटवर्क सारे सिम बेकार पड़े बंद हो गए। कोई कूरियर सर्विस नहीं, बस पोस्ट ऑफिस का सहारा है, इस मनोरम जंगल में शहर से दूर सरकारी सेवा का आनंद ही अनोखा है, बस रिटायरमेंट के बाद, पेंशन का न होना ही बहुत बड़ा धोखा है। देख कर लोगों का भविष्य और अपना मन में डर सा लगता है, निजीकरण की यह फायदेमंद भूख क्या जनता के साथ धोखा है। आसियाना

नरसिंह यादव VS सुशील कुमार : सुशील कुमार हत्या के मामले में गिरफ्तार

#नरसिंह यादव vs #सुशील कुमार एक ही वेट वर्ग में रियो ओलंपिक जाने के लिए नरसिंह यादव बनाम सुशील कुमार वाला मामला था,, नरसिंह क्वालिफ़ाई कर चुका था... अगर वह अपना नाम वापस लेता तो ही सुशील कुमार ओलंपिक जा पाता... सुशील कुमार की तरफ ताकत थी, उसके ससुर महाबली सतपाल थे, नॉर्थ की मजबूत रेसलिंग लॉबी का पोस्टर ब्वॉय था सुशील कुमार. महाराष्ट्र के नये लड़के नरसिंह यादव ने दुस्साहस कर लिया इन सबको चुनौती देकर, वह पैसै के लालच और धमकी किसी भी चीज के आगे नहीं झुका.... फिर हरियाणा के ट्रेनिंग कैंप में प्रेक्टिस के दौरान रहस्यमयी तरीके से कुछ ही दिनों बाद वह डोप में फंस गया,, उसने रो रोकर कहा कि मुझे फसाया गया है, परिवार रोया मीडिया के सामने.. IOA ने 4 साल का बैन लगाया.. प्रधानमंत्री मोदी से जांच की मांग की.. कि बैन हटवा दो सर, जांच करवा दो,,, लेकिन मोदी सरकार ने भी रफ़ा दफा का खेल खेला। जैसे बंगाल में खेला हो गया, बिहार में भी खेला हुआ। बंगाल में सत्तारूढ़ लोग भाजपा से धन-दौलत ऐंठने के बाद भी मन से ममता के साथ थे. बिहार में तेजस्वी की अभिमन्वीयता की हार्दिक प्रशंसा के बावजूद भी वह सत्तारूढ़ शक्ति वि...

मोहिनी

"मोहिनी” वह बहुत सुंदर थी। आईसीआईसीआई बैंक के काउंटर पर पैसा जमा करती थी। पहले दिन उसने पैसा जमा करने में मेरी मदद की, मैं पहली बार आईसीआईसीआई बैंक में पैसा जमा करने गया था। मैं वहां पर कैश जमा करने की पर्ची खोज रहा था। उसने कहा पेपरलेस जमा होता है। मैंने उसको अपनी मोबाइल दे दी, बैंक एप को ऑन कर दिया और उसने एमाउंट पूछा और अपनी कोमल अंगुलियों से मोबाइल पकड़े हुए मेरे हाथों को स्पर्श करते हुए पेपरलेस की पर्ची भर दी। मैंने उसे 50000 का कैश दिया और तुरंत एक मिनट के अंदर वह हमारे अकाउंट में दिखने लगा। अमाउंट जमा हो जाने के पश्चात ही मुझे उसके हाथों के कोमल स्पर्श की अनुभूति हुई। उसके पहले मेरे अंदर एक भय था कि कहीं वह अकाउंट से कोई छेड़छाड़ न कर दे। उसकी कोमल अनुभूतियां मेरे जेहन में कहीं न कहीं अपनी छाप छोड़ दी, किंतु मैं उसे अनुभूत नहीं कर पा रहा था।  किंतु आज दूसरा हफ्ता था और मैं फिर लगभग 40,000 का अमाउंट जमा करने के लिए वहीं गया। किंतु आज काउंटर पर वह मुस्कुराता हुआ गोरा प्यारा चेहरा नहीं था। मुझे आज उस तरह से मुस्कुराते हुए स्वागत और सहायता करने वाली अनुभूति महसूस नहीं हुई। मैंन...

वे और हम

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  वे और हम वे हमें चाहते हैं हम उन्हें चाहते हैं हम दोनों एक दूसरे के प्रति नरम हैं हम दोनों की अभिलाषाएं है मिलें और ठंडी कर लें सारी जरूरतें शरीर की हमें पता है हम एक दूसरे को खुब आनंद देंगे पर समस्या है कि वे और हम शादीशुदा हैं और अपने साथी को बहुत प्यार करते हैं इसलिए डरते हैं कि वे हमारे प्यारे नहीं समझेंगे और हमारी जिंदगी उलझ जाएगी काश समझते शरीर की जरूरत होती है प्यार अलग और प्यास अलग होती है। रचित : संतोष गोवन / 20/04/21

विद्वान अँधेरा, ढपोरशंखी सूर्य, दोनों हमारे हैं, और हम, उनके सहारे हैं, इसलिए, थके हुए, हारे हैं...

  प्यारे पाठक मित्रों, आज महान प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल के जीवन रेखा एवं रचना संसार के अंतर्गत उनकी रचना "आग का आईना" के बारे में जानकारी दी जा रही है............ आग का आईना    प्रस्तुत काव्य संग्रह केदारनाथ अग्रवाल का ऐसा काव्य संग्रह है जिस में कवि के व्यक्तित्व के वि कास को देखा जा सकता है। काव्य संग्रह का प्रकाशन जुलाई , 1970 ई. में हुआ। इसमें संकलित 106 कविता एं , सितंबर , 1960 से मार्च , 1970 तक के बीच लिखी गई थीं। इस पुस्तक के बारे में केदारनाथ अग्रवाल कहते हैं कि “इसकी कविताएं पहले की मेरी कविताओं से बिल्कुल भिन्न हैं। दोनों के बीच की दूरी मेरे पहले और अब के केदार के बीच की दूरी है। यह दूरी मेरे दोनों अस्तित्वों को एक क्रमिक विकास से जोड़े है।” 34       इस संग्रह में केदारनाथ अग्रवाल का वह अनुभव पिरोया गया है , जिसे वे सरकारी वकील बनने के बाद अनुभव किए। केदार जी देश के विद्वानों और नेताओं के विषय में जो अनुभव किया उसे साफ लिख दिया है-            ...

हड्डी की लोहे से टक्कर : फूल नहीं रंग बोलते हैं

 दोस्तों, केदारनाथ अग्रवाल के रचनासंसार की इस कड़ी में कई कारणों से सतत लेख प्रस्तुत नहीं हो पा रहे हैं, किंतु जैसे ही समय मिलता है, इसको निरंतरता देने की कोशिश जारी रहेगी.............. 'फूल नहीं रंग बोलते हैं' नाम  उनकी रचना के बारे जानकारी प्रस्तुत की जा रही है। यह काव्य संग्रह  उल्लिखित कवि की प्रतिनिध रचनाओं में से एक है। इसमें भारतीय समाज के किसानों, मजदूरों की दशा और संघर्ष को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है।                           फूल नहीं रंग बोलते हैं   प्रस्तुत काव्य संग्रह का प्रकाशन अक्तूबर 1965 ई. में परिमल प्रकाशन , इलाहाबाद द्वारा किया गया था। इस कविता संग्रह की भूमिका ‘मेरी ये कविता एं’ में स्वयं केदार नाथ अग्रवाल लिखते हैं कि “पहले भी मेरे तीन काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। अब उ नम ें से एक भी उपलब्ध नहीं हैं। यह संकलन उस कमी की पूर्ति कर ता है।” 28 जिससे स्पष्ट होता है कि कवि ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’ काव्य संग्रह को अपने काव्य जीवन का प्रवेशांक म...